• Kumar Vivek Garg

ये बचपन बचाओ



नन्हीं बाहें बोझ उठा रही है, अपने कंधों पर भूख की , ये दृश्य आँखों में चुभ जाता है, हालात ऐसे ऐसे नज़र आते हैं, देख कलेजा फट जाता है।

राजनीति को दिखता दर्द नहीं इन मासूमों का, फैली धरती और खुला आसमान छोड़, कुछ भी और नहीं जिनका।


थोड़ी सी इंसानियत और रहम के भूखे हैं , बाकी भूख तो खुद ही मिटा लेंगे, कुछ काम देकर तो देखो, दो हाथों के सिवा कुछ भी और नहीं उनका।

सड़कों पर सोते  बचपन, कचरों को ढोते बचपन, पाप किसी और का, और उसका दर्द उठाते बचपन, उन तरसती आँखों पर थोड़ी तरस तो दिखाओ, जो काम के नहीं तुम्हारे, उनकी खुशी हो सकती है, अपने बेकार और बचे हुए देकर,. थोड़ा सा प्रेम और दया तो दिखाओ., बुझते दीये से जूझते बचपन,. ये बचपन बचाओ।



हो सकते हैं ये भी संसाधन राष्ट्र के, इनको भी तो पाठ पढ़ाओ, कर सकते है ये भी काम बड़े, जरा सी राहें तो दिखाओ, ये भी सम्मान को पा सकते, जरा इनके लिए भी मौके तो बनाओ, व्यर्थ होते धन से मिटते बचपन,. ये बचपन बचाओ।



नन्हीं बाहें बोझ उठा रही है, अपने कंधों पर भूख की , ये दृश्य आँखों में चुभ जाता है, हालात ऐसे ऐसे नज़र आते हैं, देख कलेजा फट जाता है।


थोड़ा सा तो अपना भी दिल पत्थर पिघलाओ, असामयिक बड़े होते बचपन, ये बचपन बचाओ।

ये बचपन बचाओ............



"आप सब से निवेदन है, जो भी मेरी ये रचना पढ़ेंगे इसमे खामियाँ होगी लेकिन इसके मूल भाव को समझे और आप जहां भी हो वहाँ थोड़ी सी जागरूकता फैलाएं और बचपन जो सड़कों और रेलवे के किनारे दिखते हैं उस बचपन को बचाने के लिए थोड़ा प्रयास करे अगर आपके कोशिश सी एक भी बचपन बच गया तो ये किसी भी पूजा इबादत और सजदा से बड़ा है। "