• VIVEK KUMAR SHUKLA

काश! वो खिड़की खुलीं न होती


काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

चैन मेरा खोया न होता, नींदे मेरी उड़ी न होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

चाँद के टुकड़े होते हैं चेहरे, सुना था मैंने कईं लोगों से, यकीन इस पर हुआ न होता, चाँदनी अगर वो दिखी न होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

आता तो था हर सुबह यहां पर, जिदंगी मेरी अब बदली न होती, अगर नजरें उससे मिली न होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

आता हूँ अब हर शाम यहां पर, ये आदतें मेरी बिगड़ी न होती, गर बातें दो उससे हुयी न होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

सुबह-शाम था मगन मै खुद में, छूटे हैं अब कुछ काम भी अपने, ऐसी हालत अपनी हुयी न होती, अगर उधर वो ऐसे खड़ी न होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

चुपचाप गुजरता था गलियों से, मन में कोई बात नहीं थी, लेकिन अब यह धड़कन बढ़ी न होती, तुम भी मुझे पसंद हो थोड़े, हंसकर ये बात गर उसने कही न होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

मम्मी ने देखा है जिसको मेरी खातिर, होगी कोई हुर परी वो, कर देता हाँ मैं उसको, अगर नूर ये मुझको दिखी न होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

ख्वाब थे आते अजीब-अजीब से, पर थी नींदे मेरी पूरी होती, ख्वाबों की दुनिया हंसी-हंसी न होती, नींदे मेरी अधूरी न होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

किस्से मैं सुना रहा जो हँसकर, ये बातें सारी किस्से न होती, गर आकर ख्वाबों सी गई न होती, और वो ही मेरी किस्मत में होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

चैन मेरा खोया न होता, नींदे मेरी उड़ी न होती। काश! वो खिड़की खुलीं न होती।

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