• VIVEK KUMAR SHUKLA

आ चल कुछ बातें करते हैं।


आ चल कुछ बातें करते हैं, कुछ तुम कहो अपनी, कुछ हम अपनी सुनाते हैं।

अजनबीयों से क्युँ बैठें, ये सफर लम्बा है रस्तों को काटने का जरीया बनाते हैं। '*शायद तुम्हारी खामिंयाँ मेरी खुबियाँ बन जाये, और मेरी खामिंयाँ-खुबियाँ तुमको भी भा जाये, *' ऐसे इक-दूजे को समझते ये रस्ता कट जाये। अजनबीयों में हम एक ये रिस्ता बनाते है,

आ चल कुछ बातें करते है, कुछ तुम कहो अपनी, कुछ हम अपनी सुनाते हैं ।

दो तुम कहो अपनी, दो मैं अपनी कहता हूँ, तुम इक अफसाना छेड़ो नया, मैं भी इक तराना नया बुनता हूँ । इक अनजाने डगर में कुछ पहचाना ढ़ूँढ़तें हैं, इक नुतन नगर में कुछ पुराना ढ़ूँढ़तें हैं ।

आ चल कुछ बातें करते है, कुछ तुम कहो अपनी, कुछ हम अपनी सुनाते हैं ।

""कब अजनबीयों ने हर्ज किया किसी का, जब भी लोग टूटे है, कर्म रहा है अपने का।"" सीता मिली लंका में जिस पराकर्म से, वो विर हनुमान अनजाना था, रावण हारा रण को जिस अपकर्म से, वो मुखबीर बिभीषन पहचाना था। हम भी गैरों के अपना होने का, कुछ राम हनुमान सा कथा बनाते हैं।

आ चल कुछ बातें करते हैं, कुछ तुम अपनी कहो, कुछ हम अपनी सुनाते हैं ।

तुम अपनी कुछ ख्वाइहश कहो, कुछ अपना अरमान मैं कहता हूँ, कुछ तुम जान लो मुझे, कुछ मैं पहचान लुँ तुम्हें, आ अच्छी बातें जमा करते हैं, और हम एक मित्र बन जाते हैं ।

आ चल कुछ बातें करते हैं, कुछ तुम अपनी कहो, कुछ हम अपनी सुनाते हैं।

जब अनजाने बातें करते, बातें अन्नत होती है, सफर कितना भी बड़ा हो, छोटा हो जाता है, डगर कितनी भी मुश्किल हो, आसान हो जाती है, आ हम भी जिंदगी के, डगर को आसान बनाते है, तुम कदम इक बढ़ावो, मैं कदम इक बढ़ाता हूँ, दुरी को मिटाते, आगे बढ़ चलते हैं।

आ चल कुछ बातें करते हैं, कुछ तुम अपनी कहो, कुछ हम अपनी सुनाते हैं ।

आ चल कुछ बातें करते हैं।

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