• VIVEK KUMAR SHUKLA

ऐसा हुआ है कभी


अभी वो दिन कहाँ आए की हम उन्हें भुलाए, है थोड़ी सी नराजगी हमें पता है , वो खुद दूर हो जाएगी तो, मनाने हम क्यूँ जाए... ये खुशियां अकेले की थोड़ी है मेरी, हिस्सा है उनका भी बराबर का बताओ भला , वो कैसे ना आयें .. थोड़े से हालात बदले हैं जज्बात नहीं, थोड़े से चाल बदले है ,उसकी आहटें नहीं , भला कैसे ना पहचान ले हम उनको , कभी ऐसा हुआ है क्या कि चाँद निकले फलक पर , और चकोर दीदार करने ना जाये।

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